Wednesday, October 22, 2008

शक्ति और क्षमा

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनीत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे ।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से ।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो , तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की ।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

-रामधारी सिंह 'दिनकर'

Sunday, October 19, 2008

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव २००८

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ सर्वश्रेष्ठ छात्र संघो में एक है। छात्र संघ चुनाव के तारीख की घोषणा हो चुकी है और सारे राजनीतिक दल चुनाव की तैयारी में जुट गई है। खास बात यह है कि यहाँ चुनाव की सारी प्रक्रिया छात्रों द्वारा ही निष्पादित किया जाता है। इसमे विश्वविद्यालय प्रशासन का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है।

अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव एवं संयुक्त सचिव सहित कुल ३४ पदों के लिए मतदान होता है। १६-१७ अक्टूबर, दो दिन चली नामांकन प्रक्रिया में इन पदों के लिए कुल ३९० नामांकन दाखिल किए गए। १९ अक्टूबर नामांकन वापस लेने की आखिरी तिथि थी। इस दरम्यान सारे दल अपने चुनाव पूर्व बैठक कर के अपने प्रतिनिधि का अन्तिम फैसला और अपने चुनावी रणनीति बनाने में लगे रहे। २० अक्टूबर से सारे दल अपने उम्मीदवारों के प्रचार-प्रसार में लग जायेगी। यहाँ छात्र संघ के प्रतिनिधियों के इस्तीफा देने के २८ दिनों के अन्दर चुनाव संपन्न करा लेने का प्रावधान है। चुनाव आयोग के सारे सदस्य भी यहीं के अनुभवी छात्र होते हैं।

चुनाव से पूर्व सभी विद्यालयों में वर्त्तमान पार्षदों द्वारा उनके पिछले कार्यो का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाता है जिसपर उस विद्यालय की आमसभा द्वारा निर्णय लिया जाता है और इसी के साथ सारे दल अपने संभावित उम्मीदवार की तलाश शुरू कर देते हैं।

चुनाव आयोग द्वारा घोषित तिथियों के अनुसार ३ नवम्बर को मतदान होना तय है। उससे पूर्व सारे विद्यालयों में भी चुनाव में भाग ले रहे उम्मीदवार के बीच वाद-विवाद रखी जाती है जिसमे दूसरे दल के उम्मीदवार समेत आम छात्र भी अपने होने वाले प्रतिनिधि से अपने सवाल पूछते हैं। इसके बाद १ नवम्बर को झेलम मैदान में (झेलम छात्रावास के समीप) विश्वविद्यालय आमसभा की जायेगी जिसमे सारे केंद्रीय पदों के उम्मीदवार हिस्सा लेंगे और अपना पक्ष रखेंगे। इसके दूसरे दिन २ नवम्बर को रात्रि के भोजन के बाद अध्यक्षीय पद के उम्मीदवार सारे छात्रो से रू-ब-रू होंगे जिसका पूरे विश्वविद्यालय को साल भर से इंतज़ार रहता है। इस दौरान वो अपने दल के विचार, सिद्धांत और चुनावी मुद्दा रखेंगे। इस अध्यक्षीय भाषण पर पूरे देश की ही नहीं अपितु पश्चिमी पूंजीवादी देशो के शैक्षणिक संस्थानों की भी नजर होती है। यह कहना न होगा कि पिछले कुछ सालो से इसके स्तर में गिरावट आयी है। ३ नवम्बर को विभिन्न विद्यालयों में बने मतदान केन्द्रों पर छात्र मतदान करेंगे जिसकी गिनती उसी दिन रात के ९ बजे से शुरू हो जायेगी और ५ नवम्बर को परिणाम की घोषणा कर दी जायेगी और ६ नवम्बर से नए चुने गए प्रतिनिधि अपना कार्य-भार संभाल लेंगे।

इस चुनाव में सामिल होने वाले प्रमुख राजनीतिक दल हैं-अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP), नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया (NSUI) , आल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन (AISA), स्टूडेंट्स फेडरेशनऑफ़ इंडिया (SFI) , यूथ फॉर इक्वलिटी (YFE), आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF), इत्यादि। यहाँ के चुनाव में सारे दल हाथ से बने बैनर और पोस्टर का इस्तेमाल करते हैं और छात्रों से व्यक्तिगत संपर्क करते हैं। लेकिन नए तकनीक के आ जाने से हाल के कुछ वर्षों में यहाँ का चुनाव प्रचार भी उच्च तकनीक से लैस हो गया है। लोग एस० एम० एस०, ई-मेल, ब्लॉग इत्यादि का भी सहारा ले रहे हैं।

यहाँ का चुनाव एक आदर्श चुनाव माना जाता है क्योंकि यहाँ धन और बाहुबल की नहीं बल्कि सिद्धांतों की राजनीति होती है। यहाँ का चुनाव जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, इत्यादि से ऊपर उठकर होता है। लोग अपने उम्मीदवार का प्रचार निष्पक्ष तरीके से करते हैं। लेकिन इसका काला सच यह भी है कि राजनीतिक दलों के कार्यकर्त्ता जाति, धर्म, क्षेत्र, इत्यादि के नाम पर भी मतदाताओ को अपने पक्ष में करने में लगे रहते हैं। राजनीतिक दलों का चुनावी मुद्दा विश्वविद्यालय परिसर की समस्याओं को छोड़कर सभी कुछ होता है। ये दुनिया भर की बातें करेंगे सिवाय छात्रों की मुख्य समस्याओं के। ये नए छात्रों को नामांकन से ही उसे एक मत के रूप में देखते हैं और अपने दल में शामिल करने की कोशिश करते रहते हैं। जिसका बुरा असर नए छात्रो पर पड़ता है। पर इन राजनीतिक दलों को इससे क्या लेना-देना उन्हें तो अपना वोट बैंक की राजनीति करनी है और आदर्श, छात्र हितों कि रक्षा कराने वाला दल कहलाना है।

Thursday, October 16, 2008

झेलम छात्रावास

झेलम छात्रावास जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उत्तरी मुख्य प्रवेश द्वार से लगभग २०० मीटर अन्दर उत्तराखंड क्षेत्र में अवस्थित है। इसके आस-पास में गंगा, यमुना और सतलज छात्रावास, विश्वविद्यालय स्वास्थ्य केन्द्र इत्यादि है। यह विश्वविद्यालय के प्राचीनतम छात्रावासों में है। इसका निर्माण ८० के दशक में हुआ था। इसमें तकरीबन ३५० छात्र रहते हैं। यह दो भागो में विभक्त हैं-पूर्वी और पश्चिमी। प्रारंभ में इसके पूर्वी भाग में छात्र एवं पश्चिमी भाग में छ्त्रायें रहा कराती थी लेकिन अब यह पूर्णतः छात्रों के लिए है। यहाँ स्नातक के विद्यार्थी से लेकर पी० एच० डी० के शोधार्थी तक रहते हैं। इस विश्वविद्यालय के हर छात्रावास की तरह यहाँ भी प्रबंधन के लिए ४ वार्डन-प्रो० नायडू सुब्बाराव, प्रो० सौगात भादुडी, प्रो० माधव गोविन्द और प्रो० अमित प्रकाश हैं। ये छात्रों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के साथ मिलकर छात्रावास की देख-रेख करते हैं।

इस छात्रावास की अपनी कुछ परम्पराएं हैं। यहाँ के छात्र प्रतिवर्ष होली के मौके पर इसी के समीप झेलम मैदान में "चाट महासम्मेलन" नाम से एक हास्य कवि गोष्ठी आयोजित करते हैं जो की पूरे विश्वविद्यालय के लिए आकर्षण का केन्द्र रहता है। इसमे सारे लोग पूरे उत्साह से भाग लेते हैं। यह रात्रि में १० बजे से शुरू होता है और लगभग २ बजे पूर्वाहन तक समाप्त होता है। सर्वप्रथम एक बारात निकाली जाती है जो ताप्ती छात्रावास से चलकर झेलम छात्रावास आती है जहाँ परम्परागत तरीके से उसका स्वागत किया जाता है। उसके बाद कार्यक्रम शुरू होता है। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सज्जद इब्राहिम उर्फ मामू होते हैं जिन्होंने यहीं से अपना पी० एच० डी० किया है। उसके दूसरे दिन होली पूरे जोश-खरोश से मनाई जाती है। इसी के समीप गंगा ढाबा है जो शुरुआत से ही विश्वविद्यालय का सामजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक केन्द्र रहा है।

Tuesday, October 14, 2008

मोचीराम

राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे
क्षण-भर टटोला
और फिर
जैसे पतियाये हुए स्वर में
वह हँसते हुए बोला-
बाबू जी सच कहूँ-मेरी निगाह में
न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है
मेरे लिए, हर आदमी एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने
मरम्मत के लिए खड़ा है।

और असल बात तो यह है
कि वह चाहे जो है
जैसा है, जहाँ कहीं है
आजकल
कोई आदमी जूते की नाप से
बाहर नहीं है
फिर भी मुझे ख़याल है रहता है
कि पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच
कहीं न कहीं एक आदमी है
जिस पर टाँके पड़ते हैं,
जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट छाती पर
हथौड़े की तरह सहता है।

यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं
और आदमी की अलग-अलग 'नवैयत'
बतलाते हैं
सबकी अपनी-अपनी शक्ल है
अपनी-अपनी शैली है
मसलन एक जूता है:
जूता क्या है- चकतियों की थैली है
इसे एक आदमी पहनता है
जिसे चेचक ने चुग लिया है
उस पर उम्मीद को तरह देती हुई हँसी है
जैसे 'टेलीफ़ून' के खंभे पर
कोई पतंग फँसी है
और खड़खड़ा रही है।

'बाबूजी! इस पर पैसा क्यों फूँकते हो?'
मैं कहना चाहता हूँ
मगर मेरी आवाज़ लड़खड़ा रही है
मैं महसूस करता हूँ- भीतर से
एक आवाज़ आती है-'कैसे आदमी हो
अपनी जाति पर थूकते हो।'
आप यकीन करें, उस समय
मैं चकतियों की जगह आँखें टाँकता हूँ
और पेशे में पड़े हुए आदमी को
बड़ी मुश्किल से निबाहता हूँ।

एक जूता और है जिससे पैर को
'नाँघकर' एक आदमी निकलता है
सैर को
न वह अक्लमंद है
न वक्त का पाबंद है
उसकी आँखों में लालच है
हाथों में घड़ी है
उसे जाना कहीं नहीं है
मगर चेहरे पर
बड़ी हड़बड़ी है
वह कोई बनिया है
या बिसाती है
मगर रोब ऐसा कि हिटलर का नाती है
'इशे बाँद्धो, उशे काट्टो, हियाँ ठोक्को,वहाँ पीट्टो
घिस्सा दो, अइशा चमकाओ, जूत्ते को ऐना बनाओ
…ओफ्फ़! बड़ी गर्मी है'
रुमाल से हवा करता है,
मौसम के नाम पर बिसूरता है
सड़क पर 'आतियों-जातियों' को
बानर की तरह घूरता है
गरज़ यह कि घण्टे भर खटवाता है
मगर नामा देते वक्त
साफ 'नट' जाता है
शरीफ़ों को लूटते हो’ वह गुर्राता है
और कुछ सिक्के फेंककर
आगे बढ़ जाता है
अचानक चिहुँककर सड़क से उछलता है
और पटरी पर चढ़ जाता है
चोट जब पेशे पर पड़ती है
तो कहीं-न-कहीं एक चोर कील
दबी रह जाती है
जो मौका पाकर उभरती है
और अँगुली में गड़ती है।

मगर इसका मतलब यह नहीं है
कि मुझे कोई ग़लतफ़हमी है
मुझे हर वक्त यह खयाल रहता है कि जूते
और पेशे के बीच
कहीं-न-कहीं एक अदद आदमी है
जिस पर टाँके पड़ते हैं
जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट
छाती पर
हथौड़े की तरह सहता है
और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िंदा रहने के पीछे
अगर सही तर्क नहीं है
तो रामनामी बेंचकर या रंडियों की
दलाली करके रोजी कमाने में
कोई फ़र्क नहीं है
और यही वह जगह है जहाँ हर आदमी
अपने पेशे से छूटकर
भीड़ का टमकता हुआ हिस्सा बन जाता है
सभी लोगों की तरह
भाषा उसे काटती है
मौसम सताता है
अब आप इस बसंत को ही लो,
यह दिन को ताँत की तरह तानता है
पेड़ों पर लाल-लाल पत्तों के हज़ारों सुखतल्ले
धूप में, सीझने के लिए लटकाता है
सच कहता हूँ- उस समय
राँपी की मूठ को हाथ में सँभालना
मुश्किल हो जाता है
आँख कहीं जाती है
हाथ कहीं जाता है
मन किसी झुँझलाए हुए बच्चे-सा
काम पर आने से बार-बार इंकार करता है
लगता है कि चमड़े की शराफत के पीछे
कोई जंगल है जो आदमी पर
पेड़ से वार करता है
और यह चौकने की नहीं, सोचने की बात है
मगर जो ज़िंदगी को किताब से नापता है
जो असलियत और अनुभव के बीच
खून के किसी कमज़ात मौके पर कायर है
वह बड़ी आसानी से कह सकता है
कि यार! तू मोची नहीं, शायर है
असल में वह एक दिलचस्प ग़लतफ़हमी का
शिकार है
जो वह सोचता कि पेशा एक जाति है
और भाषा पर
आदमी का नहीं, किसी जाति का अधिकार है
जबकि असलियत है यह है कि आग
सबको जलाती है सच्चाई
सबसे होकर गुज़रती है
कुछ हैं जिन्हें शब्द मिल चुके हैं
कुछ हैं जो अक्षरों के आगे अंधे हैं
वे हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं
और पेट की आग से डरते हैं
जबकि मैं जानता हूँ कि 'इन्कार से भरी हुई एक चीख़'
और 'एक समझदार चुप'
दोनों का मतलब एक है-
भविष्य गढ़ने में, 'चुप' और 'चीख'
अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से
अपना-अपना फ़र्ज अदा करते हैं।

-सुदामा पांडेय 'धूमिल'

अकाल और उसके बाद

कई दिनों तक चुल्हा रोया चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोयी उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त

दाने आए घर के अन्दर कई दिनों के बाद
धुंआ उठा आँगन के ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखे कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखे कई दिनों के बाद

-नागार्जुन (1952)

Wednesday, September 24, 2008

स्पेनी भाषा

स्पेनी भाषा दुनिया मे दूसरी सर्वाधिक बोलने वाली भाषा है। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की भी आधिकारिक भाषा है। यह सिर्फ स्पेन की ही नहीं बल्कि लैटिन अमेरिका सहित कुल २१ देशो की आधिकारिक भाषा है। स्पेन मे इसकी चार उपभाषा-कास्तिल्याना, कातालान, गलिसियाई और बास्क-प्रचलन मे है। इस भाषा मे कई प्रमुख साहित्य की रचना हुई है। मिगेल दे सेर्वान्तेस द्वारा लिखित "दोन किखोते" ४०० वर्षो के बाद भी लोगो के बीच उतना ही लोकप्रिय है। इसका अनुवाद तकरीबन संसार की सभी भाषाओ मे हो चुका है। पाब्लो नेरुदा, गाब्रिएल गार्सिया मर्केज़, रुबेन दारियो इत्यादि इस स्पेनी भाषा के प्रसिद्ध कवि और साहित्यकारों मे हैं।

इस भाषा की प्रचार-प्रसार के लिए स्पेन सरकार ने "Instituto Cervantes" की स्थापना की है। यह संस्थान स्पेनी भाषा मे अंतर्राष्ट्रीय डिप्लोमा के लिए परीक्षा आयोजित करता है जो की शिक्षा, सामजिक नीति एवं खेल मंत्रालय, स्पेन सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है जिसे दुनिया के सारे शिक्षण संस्थान एवं व्यापारिक प्रतिष्ठान भी मान्यता देते हैं।

Tuesday, September 23, 2008

स्पेनी पुर्तगाली इतालवी एवं लातीनी अमेरिकी भाषा अध्ययन केन्द्र

स्पेनी पुर्तगाली इतालवी एवं लातीनी अमेरिकी भाषा अध्ययन केन्द्र की शुरुआत हुए ३ दशक से भी ज्यादा समय गुजर गया है। आज यह दक्षिणी पूर्वी एशिया में स्पेन एवं लैटिन अमेरिका के बारे में अध्ययन करने के लिए अग्रणी संस्थानो मे एक है। यहाँ स्पेनी एवं लैटिन अमेरिकी भाषा, साहित्य, भाषा विज्ञान, सभ्यता-संस्कृति, इतिहास, सामाजिक-राजनितिक संरचना इत्यादि इन सारी चीजों की पढ़ाई होती है। इस केन्द्र मे स्नातक से पी० एच० डी० तक पाठ्यक्रम हैं। डिप्लोमा पाठ्यक्रम मे पुर्तगाली और इतालवी भाषा की भी पढ़ाई होती है।

वर्त्तमान मे प्रो० अपराजित चट्टोपाध्याय यहाँ के केन्द्राध्यक्ष हैं। "हिस्पानिक होरिजोन" १९८५ से निरंतर प्रकाशित होने वाली इस केन्द्र की वार्षिक पत्रिका है।

इस भाषा की लोकप्रियता एवं बाज़ार की ज़रूरतों को ध्यान मे रखते हुए केन्द्र मे स्पेनी भाषा की अल्पावधि पाठ्यक्रम और स्पेनी भाषी छात्रों के लिए भारतीय सभ्यता-संस्कृति के बारे मे स्पेनी भाषा मे पाठ्यक्रम शुरू करने का प्रस्ताव विचाराधीन है।

Sunday, September 21, 2008

भाषा साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान

भाषा साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान की शुरुआत जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही सन् १९६९ में हुई थी। शुरुआत में यहाँ मुख्यतः यूरोपीय एवं एशियाई भाषा-अरबी, चीनी, फ्रांसीसी, जर्मन, जापानी, कोरियाई, फारसी, रुसी एवं स्पेनी भाषा की पढ़ाई होती थी। यह पाठ्यक्रम स्नातक एवं परास्नातक साथ-साथ जुडा है। बाद में परास्नातक स्तर पर हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, भाषा विज्ञान की पढ़ाई भी होने लगी। अब इन सभी भाषाओं में पी० एच० डी० तक पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। पस्तु, मंगोलियाई, भाषा इंडोनेशिया और उर्दू भाषा में डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी उपलब्ध है। इन भाषाओं के अध्ययन एवं शोध कार्य के लिए कई केन्द्र बनायें गए हैं जो निम्न हैं-
  1. अरबी एवं अफ्रीकी भाषा अध्ययन केन्द्र
  2. चीनी एवं दक्षिणी पूर्वी एशियाई भाषा अध्ययन केन्द्र
  3. फ्रांसीसी भाषा अध्ययन केन्द्र
  4. जर्मन भाषा अध्ययन केन्द्र
  5. भारतीय भाषा केन्द्र
  6. जापानी कोरियाई एवं उत्तर पूर्वी एशियाई भाषा अध्ययन केन्द्र
  7. अंग्रेजी भाषा अध्ययन केन्द्र
  8. भाषा विज्ञान अध्ययन केन्द्र
  9. फारसी एवं मध्य एशियाई भाषा अध्ययन केन्द्र
  10. रुसी भाषा अध्ययन केन्द्र एवं
  11. स्पेनी पुर्तगाली इतालवी एवं लातीनी अमेरिकी भाषा अध्ययन केन्द्र
भाषाओं में शोध कार्य एवं विकास के लिए एक भाषा प्रयोगशाला भी है जो की विश्वविद्यालय के पुराने परिसर में स्थित है। यह भारत की सर्वोत्तम प्रयोगशालाओ में एक है। यहाँ सॉफ्टवेयर और दृश्य-आवाज पाठ्य सामग्री भी तैयार की जाती है। प्रयोगशाला की बहुत सारी मशीने जापान, जर्मनी, रूस, इरान इत्यादि देशों से उपहारस्वरूप प्राप्त हुई है। इस प्रयोगशाला में एक सभागार, तीन कैमरा युक्त विडियो स्टूडियो, विडियो प्रदर्शन कक्ष इत्यादि है। प्रो० वरयाम सिंह अभी यहाँ के संस्थानाध्यक्ष हैं। ११ वीं० पंचवर्षीय योजना के तहत इस संसथान का और भी विस्तार किया जाना है और भारतीय भाषा केन्द्र को अलग भारतीय भाषा संस्थान बनाया जाना है। साथ ही और भी अन्य भारतीय और विदेशी भाषा में पाठ्यक्रम और शोध कार्य की शुरुआत होनी है।

Saturday, September 20, 2008

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय भारत की राजधानी नई दिल्ली में प्रकृति की गोद में अरावली पर्वत श्रंखला पर१००० एकड़ क्षेत्र मे अवस्थित है। इसकी स्थापना १९६९ ई० में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरूके नाम पर हुई। यहाँ १३ संस्थानो-
  1. कला एवं सौन्दर्यबोध संस्थान
  2. जैवप्रौद्योगोकी संस्थान
  3. संगणक एवं पद्यति विज्ञान संस्थान
  4. पर्यावरण विज्ञान संस्थान
  5. सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान
  6. अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान
  7. भाषा साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान
  8. जीव विज्ञान संस्थान
  9. भौतिक विज्ञान संस्थान
  10. सामाजिक विज्ञान संस्थान
  11. विशिष्ट परमाण्विक औषधि केन्द्र
  12. विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र और
  13. विधि और शासन अध्ययन केन्द्र
मे लगभग ५००० छात्र एवं छात्राएँ विभिन्न पाठ्यक्रम स्नातक से पी० एच० डी० तक मे अध्ययनरत हैं। स्नातक की पढ़ाई सिर्फ़ विदेशी भाषा में भाषा साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संसथान में ही होती है शेष संस्थानों में परास्नातक एवं उससे आगे के पाठ्यक्रम हैं। यहाँ एक केंद्रीय पुस्तकालय है जिसमे विभिन्न विषयों के ५.४५ लाख पुस्तको का संग्रह है। पुस्तकालय ९६५ पत्रिका का नियमित सदस्य है और १४८ पत्रिका उपहारस्वरूप या आदान-प्रदान के जरिये आती है। इसके अत्याधुनिक वातानुकूलित साइबर पुस्तकालय मे १५३ संगणक यन्त्र इन्टरनेट सुविधा के साथ उपलब्ध है और अंधे छात्रों के लिए विशेष सुविधा है। यह एक आवासीय परिसर है। छात्रों के रहने के लिए १६ छात्रावास - गंगा, झेलम, सतलज, यमुना, पेरियार, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी, साबरमती, ताप्ती, माही, मांडवी, लोहित, चंद्रभागा, ब्रहमपुत्र एवं महानदी - चार भाग उत्तराखंड, दक्षिनापुरम, पस्चिमाबाद और पूर्वांचल मे विभाजित है एवं एक नए छात्रावास कोयना का निर्माण कार्य प्रगति पर है।

प्रो० यशपाल और प्रो० बी० बी० भट्टाचार्य यहाँ के कुलपति एवं उपकुलपति हैं। यहाँ के विद्यार्थी पढ़ाई ही नही बल्कि राजनीति में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ सर्वश्रेष्ठ छात्र संघो में एक है। यहाँ कई छात्र राजनितिक संगठन हैं जिनमे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP), नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया (NSUI), आल इंडिया स्टुडेंट असोसिएशन (AISA), स्टुडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (SFI), आल इंडिया स्टुडेंट फेडरेशन (AISF), बहुजन स्टुडेंट फ्रंट (BSF) इत्यादि। छात्र संघ का चुनाव प्रति वर्ष अक्टूबर या नवम्बर महीने में होता है। यहाँ बाहुबल की नहीं बल्कि सिद्धांतों की राजनीति होती है।

Friday, September 19, 2008

गया-एक परिचय

मैं बिहार राज्य के मगध प्रमंडल एवं गया जिला मुख्यालय गया शहर का रहने वाला हूँ। प्राचीन काल में इसे मगध कहा जाता था और यहाँ के निवासी मागध। यह झारखंड और बिहार की सीमा पर फल्गु नदी (निरंजना नदी) के किनारे अवस्थित है। गया की प्रसिद्धी मुख्य रुप से एक धार्मिक नगरी के रुप में है। इस शहर के नाम के साथ एक कहानी जुड़ी है। कहते हैं पहले इस शहर में गयासुर का राज हुआ करता था। जब भगवन विष्णु ने उसका वध करते समय उसे एक वरदान मँगाने को कहा तो उसने इस शहर का नाम अपने नाम पर रखने की इच्छा जाहिर की। तभी से इस शहर का नाम गया है। हर वर्ष आश्विन माह के कृष्ण पक्ष में पितृपक्ष के अवसर पर देश-विदेश के हजारो श्रद्धालु अपने पूर्वजो की आत्मा की जन्म - जन्मान्तर के बंधनो से मुक्ति, मोक्ष एवं स्वर्ग की प्राप्ति के लिए यहाँ पिंडदान करने आते हैं। यह शहर सड़क, रेल और वायु तीनो मार्गों द्वारा जुडा है। यह गया रेलवे स्टेशन से १ किलोमीटर एवं बिहार एवं झारखण्ड के एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा सुजाता अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा से ४ किलोमीटर एवं बिहार की राजधानी पटना शहर से १०० किलोमीटर की दुरी पर है। गया का उल्लेख महाकाव्य रामायण में भी मिलता है।

गया के दर्शनीय एवं धार्मिक स्थल - विष्णुपद मन्दिर, मंगलागौरी, रामशिला, बोधगया, वानावर (बराबर) पहाड़ एवं गुफा, बिथोशरीफ़ इत्यादि।

विष्णुपद मन्दिर का निर्माण १७८७ में इंदौर (मध्य प्रदेश) के होल्कर वंश की साम्राज्ञी महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था जो की हिन्दुओं के लिए काफी पवित्र स्थल है। कथाओ के अनुसार जब भगवन विष्णु गयासुर का वध करने को अवतरित हुए थे उसी समय उनका पद चिह्न यहाँ अंकित हो गया था जो कि मन्दिर परिसर में मौजूद हैं और यहाँ इसी कि पूजा होती है और मन्दिर का निर्माण भी इसी पद चिह्न के ऊपर किया गया है। लोगो का यह भी मानना है की यहाँ गयासुर का शाप है कि इस जगह पर प्रतिदिन कम-से-कम ५ चिता नहीं जली तो प्रलय आ जाएगा। एक कहानी फल्गु नदी से भी जुड़ी हुई है। जब भगवन राम अपनी पत्नी सीता सहित अपने पिता का पिंडदान करने आए थे तभी सीता ने इस नदी की गद्दारी पर इसे श्राप दिया की तू हमेशा सूखी रहेगी। पितृपक्ष के अवसर पर इसमे काफी भीड़ रहती है। वर्त्तमान में इस मन्दिर का संचालन यहीं के पंडा लोग करते हैं जिसे प्रसाशन द्वारा "विष्णुपद मन्दिर न्यास" में परिवर्तित करने की कोशिश की जा रही है ताकि मन्दिर परिसर का समुचित विकास और श्रधालुओं को बेहतर सुविधा दिया जा सके।

बोधगया यहाँ से १३ किलोमीटर की दुरी पर स्थित है जो बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए बहुत ही पवित्र स्थल है। यही पीपल के पेड़ (बोधी वृक्ष) के निचे राजकुमार सिद्धार्थ को बुद्धत्व (ज्ञान) की प्राप्ति हुई थी तभी से वे भगवान बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए। उसी पीपल के पास सम्राट अशोक ने मन्दिर का निर्माण करवाया जो आज महाबोधि मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है जिसके पुरे मन्दिर परिसर को वर्ष २००२ में यूनेस्को द्वारा विश्वदाय स्मारक घोषित किया गया है। यहाँ प्रतिवर्ष दिसम्बर के महीने में कालचक्र पूजा एवं बौध महोत्सव का आयोजन किया जाता है जिसमे देश-विदेश के लोग भाग लेते हैं। कालचक्र पूजा के लिए ये अपने सर्वोच्च धर्म गुरु दलाई लामा या करमापा लामा या दोनों को बुलाते हैं।

वानावर पहाड़ एवं गुफा यहाँ से लगभग २० किलोमीटर उत्तर मे स्थित है। पहाड़ के ऊपर भगवान शिव का मन्दिर है, जहाँ हर वर्ष हजारों श्रद्धालू सावन के महीने मे भगवान जल चढाते है। कथाओं के अनुसार इस मन्दिर का निर्माण बानासुर नामक राक्षस ने करवाया था। पुनः सम्राट अशोक ने इसकी मरम्मत करवाया। इसके नीचे सतघरवा की गुफा है, जो प्राचीन स्थापत्य कला का नमूना है। इस पर जाने हेतु पातालगंगा , हथियाबोर और बावनसीढ़ी तीन मार्ग है, जो क्रमशः दक्षिण, पश्चिम और उत्तर से है, पूरब में फलागु नदी है। वानावर गुफा बौद्ध धर्म के लिए महत्वपूर्ण है। यह बराबर और नागार्जुनी श्रृंखला के पहाड़ पर स्थित है। इस गुफा का निर्माण बराबर और नागार्जुनी पहाड़ी के बीच सम्राट अशोक और उनके पोते दशरथ के द्वारा कराइ गई थी। इस गुफा उल्लेख ई।एम. फोस्टर की किताब " पैसेज टू इंडिया" में भी किया गया है। इन गुफओं में से ७ गुफाएं भारतीय पुरातत्व विभाग की देखरख में है।

गया में अवस्थित मगध विश्वविद्यालय बिहार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है। इसके अंतर्गत मगध एवं पटना प्रमंडल के ४४ महाविद्यालय एवं ८५ मान्यता प्राप्त महाविद्यालय हैं जिसमे गया महाविद्यालय , अनुग्रह नारायण स्मारक महाविद्यालय, जगजीवन महाविद्यालय, मगध महिला महाविद्यालय इत्यादि प्रमुख हैं जिसमे कला, विज्ञान, वाणिज्य, प्रबंधन, विधि इत्यादि की शिक्षा दी जाती है। यहाँ अनुग्रह नारायण मगध आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, यूनानी तिब्ब महाविद्यालय, होम्योपैथी महाविद्यालय इत्यादि भी है।

शहर से ५ किलोमीटर की दुरी पर मानपुर नामक स्थान है जहाँ लोग कपडा उद्योग से जुड़े हुए हैं। पहले यहाँ भागलपुर के रेशम के भी कपडे बनाये जाते थे लेकिन कुछ आतंरिक समस्याओं के कारण अब उनका उत्पादन बंद हो गया है जिसे पुनः शुरु करने की कवायद चल रही है। बोधगया एवं विष्णुपद मन्दिर के कारण यहाँ के काफी लोग पर्यटन व्यवसाय से भी जुड़े हुए हैं। अक्टूबर से फरवरी तक बड़ी संख्या में चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका, श्रीलंका इत्यादि देशो से पर्यटक आते हैं। यहाँ की तिलकुट, अनरसा, लाई इत्यादि मिठाई बिहार एवं झारखण्ड ही नहीं बल्कि पुरे भारत में प्रसिद्ध है।